Sunday, 9 October 2016

जब भी ये'' दिल उदास होता है.,


***

जब भी ये दिल उदास होता है ,
यहीं -कहीं तू' मेरे आस-पास होता है.. 
इसी यक़ीन पे रातों को नींद आती है,
मेरी नींदों में कहीं तू' भी है जो सोता है..

***

मुझे इस बात का हर रोज़ फ़क़्र होता है,
तेरी ख़ुशियों से मेरे दर्द का क़द' छोटा है..
दिलों के दरम्यान दूरी तेरी' मजबूरी है,
ये भी एहसास मुझे बार-बार होता है.. 
नहीं ऐसा नहीं कि फ़िर कोई ज़िया''नहीं मिली ,
मग़र ये प्यार है बस एक' बार होता है.. 
बस यही सोच कर ये दिल मेरा नहीं रोता ,
तू' भी क़तरों में संग आँसुओं के बहता है.. 
ज़ुबाँ पे नाम तेरा' ख़ुद -ब ख़ुद ही आता है,
ज़िक़्र जब भी कहीं शहर' का तेरे होता है.. 

***

कभी ज़हन में दर्द बनके जो' उभरता है,
इससे मुझमे तेर 'होने का यक़ीन बढ़ता है.. 
पास मेरे यही' बस एक जमा पूँजी है,
बदौलत जिसकी' ये दिल कोई ग़ज़ल कहता है.. 

***

                                                                                                                                                               ©

Thursday, 11 August 2016

"जन्मदिन मुबारक़ हो.!


  ...कभी कभी सोचता हूँ कि,ये जो क़शमक़श होती रहती है मुझे अक्सर..क्या ये कभी ख़त्म भी होगी .?
,और फिर अपने जवाब के चलते ख़ुद पर ही हँसने का मन होता है.,थोड़ा मुस्कुरा भी लेता हूँ..लेकिन फिर अपने जवाब पर कुछ देर के लिए रुक जाना भी चाहता हूँ..
.,जवाब ही ऐसा है, क्या करूँ.,कैसे न रुकूँ?
हाँ,! ख़त्म होगी..,क्यूँ नहीं होगी.,भला ऐसी भी कोई चीज़ है क्या इस दुनियाँ में .?.,जो शुरू हो जाय और ख़त्म ना हो..

*** कुछ साल पहले...

उस दिन मेरा जन्मदिन था.
अगस्त.,२००८.घर से आये अभी पूरे एक महीने नहीं हुए थे.,इसलिए घर नहीं जा सके थे.माँ -पापा सबने सुबह ही फ़ोन करके आशीष दिया था.
लाडो,और माधव से रात में ही बात हुई थी.फिर अभिषेक भैया और आरती दी के सन्देश भी मिले थे.
सुबह उठे तो हनुमानगढ़ी.,फिर हज़रत बाबा की पुरानी मज़ार पर भी गए.कॉलेज ८:३० से था..देर ना हो इसलिए वहीँ से कॉलेज की राह पकड़ ली.
पहुँचे, तो प्रेयर शुरू होने वाली थी.क्लास में एंट्री की तो..ब्लैकबोर्ड पर बड़े और बोल्ड लेटर्स में लिखा नज़र आया..
"हैप्पी बर्थडे...
मुझे देखते ही सबने एक साथ...खूब ज़ोर से हैप्पी बर्थडे कहकर विश किया.
सबसे एक-एक कर मिलने के बाद .,हम लोग प्रेयर-ग्राउंड पर पहुँचे.
उस दिन हमारी क्लास की लाइन सबसे बाद में लगी थी.
प्रेयर शुरू हुई..
'दया कर दान भक्ति का हमे परमात्मा देना.! दया करना हमारी आत्मा में शुद्धता देना..!'
आज भी इस प्रेयर की ग़र एक पंक्ति भी बोलता हूँ.,तो ख़ुद को वहीँ
प्रेयर-ग्राउंड में देखता हूँ..
प्रेयर के बाद हम सब क्लास में थे.हमारे क्लास-टीचर आये.,हमारी अटेंडेंस हुई..और जाते वक़्त मेरी पीठ थप-थपाकर आशीष भी दिया.
गुरुजनों के आशीष में शायद., या कहूँ कि.,यक़ीनन एक अजब ही ताक़त होती है.उस क्षण को याद कर आज भी रोम-रोम पुलकित हो उठता है.
इसके बाद रोज़ ही की तरह कक्षाएँ चली.,और क्रमशः सभी शिक्षकों के आशीष का गौरव प्राप्त हुआ.
दो बजे हमारी छुट्टी के बाद हम सभी दोस्त अशफाक़ भाईजान के कैफ़े पहुँचे..जिसका नाम था.,"गुस्ताख़ी माफ़ हो,!"
अशफाक़ भाई हम सब से पाँच-छह साल बड़े थे.,पर रहते वो हम लोगों के साथ दोस्तों की तरह ही थे.
रेस्तरां ज्यादा बड़ा नहीं था.,लेकिन हम उसे छोटा लगने ही नहीं देते थे.हम सब पहुँचते तो भाईजान सारी कुर्सियाँ बाहर लगवा देते..और जब कोई और आता,.तो हम अपनी कुर्सियां आपस में शेयर कर लेते थे.
इस तरह उनका रेस्तरां भी चलता रहता., और हमारा रिश्ता भी..
भाईजान के साथ भाभीजान..और दो और सहयोगी थे.कभी कभी यहाँ उनके अब्बू भी आते थे.,उनकी बिटिया और हम सबकी लाडली अनम' को अपनी गोद में लेकर.
भाईजान को जैसे ही ख़बर हुई कि,आज मेरा जन्मदिन है..दौड़ कर आये और गले लगते हुए मुबारक़ बात दी.भाभीजान ने अन्दर से झाँकते हुए ज़ोर से...कहा था-मुबारक़ हो भाईजान...! बहुत बहुत मुबारक़ हो.!
उस दिन भाभीजान ने..मुझे कॉफ़ी के साथ एक चौकलेट-पेस्ट्री बोनस में दी थी..,क्यूँकि उन्हें पता था कि,हमे ये ऑड-कॉबिंनेशन बहुत पसंद है.सबने अपनी अपनी पसंद की चीज़ें खायीं और कुल मिलाकर ८०० बिल आया १० लोगों का...जो हम लोगों ने ही काउंट किया था.
भाईजान उस दिन हमसे बिल लेते. ये आसान बात थोड़े ही थी..ऊपर से भाभीजान भी तो थी वहाँ.,वो हम पर इमोशनल अत्याचार ना करें ऐसा हो सकता था क्या..?
आते वक़्त हम लोग पैसे काउण्टर पर रखकर भाग आये थे..७५० रूपये...और ये भी कहा था..कि,भाभी आपकी तरफ़ से हमने ख़ुद को ५० रूपये शगुन के दे लिए.
और उसका भाभीजान ने जवाब ये दिया था..,कि,लौटिये,.! जायेंगे कहाँ फिर बताते हैं हम आपको.,कि शगुन क्या होता है.?
हमारे अपने जब हमे जीता हुआ और ख़ुद को हारा हुआ पाते हैं., तो ऐसी ही मीठी चेतावनी देते हैं..भाभी भी वही कर रहीं थीं.
अब तक कुछ पाँच बजने वाले थे..हम सबने एक दूसरे को बाय बोला और फिर कल मिलने के वादे के साथ अपने-अपने घरों की ओर चल पड़े.
इसके बाद हम और सौरभ..सौरभ के घर गए.माँ ने सेवइयाँ बनायीं थी ख़ास मेरे लिए.वहाँ से लौटते लौटते यही कुछ आठ बजने को रहे होंगे.
उस दिन सुबह से.,थोड़ी-धूप थोड़ा-छाँव सा मौसम था.लेकिन पिछले एक दो घंटे से मौसम कुछ मिज़ाज़ में लग रहा था.हवाएं चलना अब बंद हो गयीं थीं.और आसमान एक ओर से बादलों से भरता चला आ रहा था.ऐसा लग रहा था..कि,आज धरती पर जितने भी महादेव हैं.,सबका रुद्राभिषेक होने की तैयारी है..इस श्रावण-मास में..

***

अभी मेरे कमरे की दूरी यही कोई 5-6 किलोमीटर शेष रही होगी कि.,तभी बादलों ने पानी की पोटली खोलनी शुरू कर दी..टिप..टिप.,टिप..
थोड़ी सी बूँदा-बाँदी में ना हम रुकना ही चाहते हैं..और ना हमारी स्थितियाँ हमे रुकने ही देती हैं.लेकिन जब बूँदें संख्या में बढ़ जाती हैं.,तो हमें अक्सर रुकना ही पड़ता है..वही हुआ..बूँदें अब बारिश बनने लगी थी..लोग धीरे-धीरे कहीं न कहीं शरण लेने लगे थे..हमने भी पास ही एक चाय की दुकान पर शरण ली.
अभी थोड़ी देर ही हुई थी कि,,इसी बीच कहीं से सिगरेट की गंध ने मुझे आवाज़ दी.,और मुझे उस शख्स को देखने की तलब हुई..जो मेरे ही इर्द-गिर्द उस वक़्त उस सिगरेट के साथ खुश होने की कोशिश में था.
अमूमन इन चीज़ों में आदमी..,एक तरह का सहारा ढूँढता है..कुछ देर के लिए ही सही पर कोई हो...उसकी क़ैद में...उसकी गिरफ़्त में..जिस पर उसका पूरा अख्तियार हो.......और जिसका उस पर भी.
बचपन से ही,.मुझमे ये ऐब रहा.,और आज भी है.,कि इसके धारक पर एक नज़र डालना मेरे लिए बड़ा ज़रूरी हो जाता है..और वो सिर्फ इसलिए.,कि,ज़रा देखूँ कौन इस वक़्त सिगरेट पीता हुआ ख़ुद को...दुनियाँ का सबसे सुखी इंसान समझ रहा है..या कौन है जो अपना गम भुलाने के लिए.,टेंशन कम करने के लिए..इस सफ़ेद-अगरबत्ती का सहारा ले रहा है.
खैर,! बचपन में तो बस ये वजह होती थी कि.,कैसे आदमी नाक से धुँआ निकालता है..?
और जब कभी किसी दधीचि को इस चिराग के साथ देखता हूँ..तो मन बड़ा व्यथित होता है.,कि आखिर क्यूँ लोग अपने अन्दर कि बची-खुची अस्थियों को भी इसके धुएँ से सींच..,उसे कुरकुरा बना रहे..?
खैर.,! ईश्वर जाने..या हम भी कभी जान पाए ढंग से....तो बताएँगे आपको भी.
मैंने देखा कि,ये सिगरेट जिन उँगलियों में थी उस शख्स का चेहरा पूरी तरह...अजनबी नहीं था.अगले ही पल हम आश्वस्त हो गए.
ये विकास था...मेरा बालपन का मित्र.
बाक़ी चीजें तो बदल गयी थी...लेकिन चहरे में कुछ ख़ास बदलाव नहीं हुए थे.अब तक उसने भी हमे देख लिया था.और हमने एक दुसरे की तरफ़ अपने अपने क़दम भी बढ़ा ही दिए थे.
उस दिन हम लोग यही कोई सात या आठ साल बाद मिले थे.
खूब अच्छे से गले लगाया.और हाथ पकड़ कर बैठ गए वहीँ उसी चाय दूकान पर.बहोत सारी बातें हुई.
गले लगाते वक़्त...बस कुछ ही सेकण्ड्स के दर्मयाँ..बचपन की कई सारी  यादें आँखों  के सामने से..फ़िसल गयीं..कैसे उसने हमे एक दफ़े.,एक रुपये का सिक्का दिया था.,कैसे रूम छोड़कर जाते वक़्त..अपना क्रिकेट बैट हमे दे गया था...और कैसे खूब-खूब रोया था.
उसने सिगरेट की एक कश ली..और उसे फेकने लगा..मैंने मन किया-अरे अब पी लो..पैसों से आती है.!
उसने फेंक दी..फिर भी और बोला-इसीलिए तो फेंक रहा हूँ.,कि फिर आ जाएगी..यार रोज़-रोज़ थोड़े ही आएगा.
कितनी अपार प्रसन्नता थी उस वक़्त..ह्रदय में..क्या कहूँ,.?
लग रहा था मानो...कोई ख़ज़ाना मिल गया हो..पर विकी हमे कुछ उदास लग रहा था..और खुल के बात भी नहीं कर रहा था..जैसे बीच बीच में कहीं खो जाता था.

***

बारिश बंद हो चुकी थी.अब उस जगह सिर्फ हम और विकास थे.हमने दो चाय मंगवाई.,और पूछा के यहाँ कैसे.?तो पता चला- छोटे भाई विवेक का लखनऊ के किसी स्कूल में दाख़िला करवाने ले गया था.उसे हौस्टल में शिफ्ट करके..वापस घर जा रहा था.
सारी बातें हो जाने के बाद भी., अभी भी..वो वैसे ही खोया-खोया था.
कई बार लगा के कुछ कहते-कहते..रह गया.
फिर हमसे नहीं रहा गया तो हमने पूछा फिर से-...बताओ ना क्या हुआ..क्यूँ उदास दिख रहे..?.,बताओ हम शायद कुछ मदद कर सकें,..
इस बार उसने मेरी तरफ़ देखते हुए मुस्कराकर कहा- काश,.! तू कुछ कर सकता यार...
मैंने फिर टोंकते हुए कहा-अब बताओ.,क्या हुआ?
...एक झटके में विकास ने कुछ कहा और आसमान में ज़ोर से बिजली कड़की थी..,शायद मुझसे कहीं दूर और किसी के बहुत पास..कोई बिजली गिरी भी थी..जिसका मुझे सिर्फ अंदाज़ा भर था..
...आज ही के दिन पापा का एक्सीडेंट हुआ था..यार..!"...उसकी आँखें भर आई थी..मैं अवाक् था.,.
"आज का दिन.,ठीक उसी दिन की तरह,...जैसे कटने को ही नहीं आता यार..8 अगस्त 2002,!
आज सात साल हो गये..पर जब भी यह दिन आता है.तो ख़ुद से भी दूर जाना चाहता हूँ,.एक अजीब सा डर लगने लगता है,.किसी से कुछ बात करने की हिम्मत ही नहीं होती..,ऐसा लगता है..कि, कहीं वो फिर कुछ ऐसी ही कोई ख़बर ना सुना दे..,जिसे सुनकर सब कुछ ख़त्म सा महसूस हो,..इस दिन कहीं से भी कोई पुकारता है.,.तो एक बारगी दिल हक्क़ सा हो जाता है.,.लगता है पापा ने बुलाया क्या..?
आँखें बंद करता हूँ..तो उनकी आँखें नज़र आती हैं..
पता है..आदि?..आज के दिन किसी भी वर्दी वाले को देखता हूँ..तो अनायास ही..दिल कचोटने लगता है...तुम्हें तो याद ही होगा ना.?कैसे पापा शाम को जब थाने से लौटते., तो पान से उनके होंठ लाल होते थे..और कैसे हमारी बिल्डिंग के सारे बच्चे उनकी वर्दी देख कर डर के मारे .,उनके सामने नहीं पड़ते थे..और हम ख़ुद डर के मारे पढ़ने बैठ जाते थे.."
..बीच बीच में उसे हिचकियाँ आती थी..आँसू थे कि.,जैसे भीतर से किसी भट्ठी से होकर आ रहे थे..और आँखों को गर्म करते हुए..अनमने ढंग से गालों पर लुढ़क जाते थे..हम उसके आँसूं पोंछते.,.वो ख़ुद को संयत करता.,.और फिर बोलने लगता..,जब गला भर जाता तो..घूँट पीकर...फिर' आगे कहता..
उस पल..ऐसा लग रहा था.,मानो किसी गर्म भट्ठी के पास खड़ा हूँ..और खुद को तपता हुआ महसूस कर रहा हूँ...साँसे सीने में उतरतीं और आँखों से भाप बन कर बहार आतीं..जैसे सीने में कोई चिता जल रही हो...
उस दिन मैंने ये महसूस किया था..कि,जब आपका दुःख बहोत गहरा होता है..तो आँसूं भी बहोत गाढ़े हो जाते हैं...

***

...रास्ते भर..हम दोनों चुप रहे..बस-स्टैंड पहुँच कर, हमने उसे बस में बिठाया.,उसकी टिकेट ली..रात के साढ़े-दस बज रहे थे..माँ जी ने जो टिफ़िन दी थी..वो उसे दी..फिर से एक चाय पी..उसे अच्छे से गले लगाया..और बस में बिठाते वक़्त, माँ और अपना ख़याल रखने की हिदायत देकर...वहाँ से वापस अपने रूम की तरफ़ चल पड़े.
उस रात ठीक से नींद नहीं आई थी..वैसे भी कम ही आती है.
कई सारे प्रश्न ख़र-पतवार की तरह.,मन में इधर-उधर उड़ रहे थे.
किसी का जन्मदिन.,किसी का मृत्युदिन..
कहीं आने का हर्ष..,कहीं जाने का विषाद..
कहीं होने की खुशियाँ..,कहीं खोने की सिसकियाँ..
कहीं पाना उपहार.. कहीं करना अंतिम-संस्कार..
कहीं इक पुष्प का खिलना.,कहीं इक वृक्ष का मिट्टी में मिलना...

***

बचपन में हमारी स्कूल के प्रधानाचार्य जी ने कभी बतलाया था..कि युधिष्ठिर ने यक्ष के सभी प्रश्नों का सहीं जवाब दिया था.जिसमे एक प्रश्न यह भी था कि,जीवन का सबसे बड़ा आश्चर्य क्या है.?
और इसका जवाब है..मृत्यु"
हम जानते हैं कि.,एक ना एक दिन सभी को इस मृत्यु-सुंदरी" से मिलना ही है..लेकिन हम इसे स्वीकार नहीं पाते.लेकिन कहते हैं न कि,वक़्त सभी ज़ख्मों को भर देता है.और धीरे-धीरे सब भूल जाते हैं.
लेकिन ऐसा तभी होता है..जब मृत्यु आश्चर्य" ही रहे..आघात" ना बने.
और किसी की ऐसी..अचानक हुई मृत्यु आश्चर्य" कम..आघात" ज़्यादा होती है..
और.,वक़्त आघात के ज़ख्मों को किस तरह भरता है...कहा नहीं जा सकता..और तो और.,मन के ज़ख्मों को भरने का सलीक़ा शायद ही इस वक़्त को पता हो..
..उस दिन से., ये जन्मदिन-वन्म्दीन के उपलक्ष्य में 'केक-काटना.,या
सो-कॉल्ड मस्ती करना..कभी अच्छा ही नहीं लगा..माँ-बाप और बड़े-बुज़ुर्गों  का आशीर्वाद मिल जाए वही बहोत है..
हाँ,.! कोशिश करता हूँ.,.उस दिन किसी बच्चे के लिए कुछ करूँ..या फिर किसी बुज़ुर्ग से उसकी ज़ुबानी सुनूँ...उसके स्पर्श से ख़ुद को उस जहाँ से जोड़ कर महसूस कर सकूँ,.जिसमें अभी तक वह जी रहा है..और,..जिसमे उसका अगला जन्म होगा..
....मृत्यु का जहाँ,
...दो-चार दिन हुए..,किसी की फेसबुक-वॉल पर..मिस यू पापा की पोस्ट पढ़ी...और उसी दिन हम एक जन्मदिन की पार्टी से वापस आये थे..
..आम तौर पर लोगों को इन बातों से कोई फ़र्क नहीं पड़ता..और पड़ना चाहिए कि नहीं..ये भी मुझे नहीं पता.
,रही मेरी इस क़शमक़श की बात..तो देखते हैं..इसका क्या होगा..?
खैर.!
.,आज जिनका भी "जन्मदिन हो..मेरी तरफ़ से ढेरों शुभकामनाएँ.!
                           "जन्मदिन मुबारक़ हो.!
                                         
                                                                            ..,ख़ुदा हाफ़िज़.!

Tuesday, 7 June 2016

..., मेरी बातों का बरगद"

तारीख़-०५मई -२०१६ 

इस पेज पर.,आज से ठीक तीन महीने पहले की भी तारीख पड़ी है.,,५ फ़रवरी२०१६.
उस दिन शायद कुछ लिखना चाहा था.,पर लिख नहीं सके थे..या कहिये के आज लिखना तय था...तो उस दिन भला कैसे लिख लेते..?
अभी इस वक़्त ज़हन में बातों का बरगद...बेज़ार सा नज़र आ रहा है..
"बरगद..
.,बहुत बड़ा सा बरगद..जिसमे ढेर सारी शाखाएं-टहनियाँ.,खूब सारी बड़ी-छोटी-घनी जटाएं..और अपनी मनमानी शैली में अपनी ऐठन के साथ तन कर खड़ा...मोटा तना.जो देखने में कहीं से भी बहोत खूबसूरत नहीं दिख रहा.लेकिन इसकी उलझी हुई शाखों में कहीं ऊपर की ओर कुछ नयी कुछ पुरानी पतंगे भी दिख रहीं हैं.जिनके कागज़ी रंग भले ही कुछ फ़ीके पड़ गये हैं.लेकिन जिनमे अभी भी कुछ तो ऐसा है.,जो कभी फ़ीका,., हो ही नहीं सकता..और वो है उन पतंगों से जुड़ी बातें...उनसे जुड़े किस्से..

***

पिछले महीने अपने शहर जाना हुआ.जहाँ बचपन शुरू हुआ..बीता..
जहाँ से किसी बरगद के बढ़ने की  शुरुआत होती है.
उस बिल्डिंग के गेट पर क़दम रखते ही.,मुझे गेट के बायीं तरफ़ लगे बिजली के खम्भे से छुपकर खम्भे और दीवार के बीच सड़क की  ओर निहारता एक १०-१२ साल का बच्चा दिखता है..जो मैं हूँ..
आज से १२-१३ साल पहले हर रविवार अपने बाबा का इंतज़ार करता हुआ..
गेट से आगे बढ़ने पर सामने के कमरे के बरामदे  में कई चेहरे.,कई आवाजें दिखाई और सुनाई पड़ीं..
सबसे  पहले हाथ में चाय की कप लिए ..आवाज़ देतीं निम्मी दी.,फिर एक तरफ़ टयूशन वाले मास्टर जी..से मार खाता मेरा अपना दोस्त विक्की..और अपना चश्मा ठीक करते मास्टर जी..जिन्होंने शायद एक बार मुझे भी मारा था.और जो लगभग रोज़ ही मारते थे विक्की को.
और फिर शर्मा अंकल की  बड़ी विडियोकॉन की बड़ी कलर टीवी.,जिस पर मैंने लगातार दो दिन दो फिल्मे देखी थीं ..दोस्ती और दुश्मनी.,हिमालय की गोद में..

***

अब उस बरामदे में बड़े रंगीन शीशे लगे हैं..और कमरों में मकान मालकिन के बेटे अपने बीवी-बच्चों के साथ रहते हैं.
गेट से भीतर आते ही थोड़ी सी जगह खाली थी .,जिसमे हम बिल्डिंग के बच्चे(रिशू.,बिट्टू.,प्रीती.,शिवम्.हनी.) क्रिकेट खेलते थे..प्लास्टिक-बॉल से..और जिसकी सिक्स की बाउंड्री.,बगल के मुकेश के घर की  दीवार हुआ करती थी.,जिस पर सिक्स लगाना तब बड़ी वीरता की बात हुआ करती थी.
.,लेकिन अब उस छोटी सी जगह में बीचो-बीच एक दीवार खड़ी कर.,उस पर सीढ़ियाँ बना दी गयीं हैं...और घर का बँटवारा किया जा चुका है.
उस दिन उस तरफ़ जाना मुमकिन न हुआ..मैं अपनी सिक्स वाली बाउंड्री नहीं देख सका,.और न ही उससे होकर ऊपर जाने वाली वो सीढ़ियाँ ही..जिनसे होकर हम ऊपर जाते थे....छुपके-चुपके अपनी पतंगे उड़ाते थे..
..और वहीँ घर के बहार ही ..किसी पीर फ़क़ीर  की  तरह ख़ामोशी  के साथ खड़ा...वो" बरगद का बड़ा सा पेड़..जिसके नीचे की छाँव का घेरा हमारे खेल का मैदान हुआ करता था.
वो अभी भी उसी ख़ामोशी के साथ वहीँ खड़ा है.,पर अब शायद ही बच्चे वहां खेलते हों.
हाँ..,अब उसका वो सूखा तना किसी ने काट दिया है...जिस पर चढ़ कर हम बच्चे उसकी लम्बी-लम्बी जटाओं को पकड़कर हवा में झूल., टार्ज़न बनने की  कोशिश किया करते थे...और गिरते-पड़ते भी थे..

***

आज सालों बीत चुके..इन पतंगों की और बरगद की  जड़ों की बातों को...उनसे जुड़े किस्सों को.,पर न जाने किन मांझों से बाँधा था मैंने,.इन किस्सों के कन्नों को...जो अभी तक टूटे नहीं..उड़ रहे हैं...
आज भी रविवार था..,
रोज़ की ही तरह सुबह उठे और चाय पीने  के लिए घाट की  ओर चल पड़े..
आज थोड़ा जल्दी पहुँच गए थे...अभी तो  रूद्र की चाय की अँगीठी सुहागन भी नहीं हुई थी.
वहीँ सीढ़ियों पर बैठ गए..कुछ देर बाद आफ़ताब मियाँ भी गंगा उस पार पेड़ों के पीछे से धीरे-धीरे  बाहर  आ गए.
अब तक चाय बन चुकी थी.रूद्र ने चाय का पुरवा थमाया.,तो हम चाय लेकर दूसरी जगह आ बैठे,.और तब तक बैठे रहे जब तक.,धूप बर्दाश्त करने के लायक थी.
वहां से वापस आकर सरसरी निगाहों से अखबार भी  पढ़ लिया.
कॉफ़ी भी ख़त्म  की.,बाक़ी सारे काम भी किये...रोज़ के.,लेकिन मन अशांत ही रहा..
इस वक़्त तकरीबन चार बजने वाले हैं.
टेबल-लैंप रौशन है..
सामने पुनीत"का ख़त-बंद लिफ़ाफ़ा रखा है..जो मेरे भाई के अपनेपन की एक मिसाल है.
उसी के पास में डुग्गू की  दी हुई पेन अपने पारदर्शी बॉक्स से झाँक रही है.,जो मेरी बहन की मेरे लिए कुछ करने की एक चाहत है.
टेबल-लैंप के बिलकुल पास रखा पेन-स्टैंड भास्कर भैया के साथ चंद-दिनों में हुई आत्मीयता की एक झलक है.
अमूल-चौकलेट का ये बड़ा सा रैपर मन्जरी दीदा की उनके छोटे भाई के लिए उनका  स्नेह दर्शा रहा है.
...और यहाँ पास में सँभालकर रखा मेरे फ़ोन का खाली डब्बा..माँ की मेरे लिए फ़िक्र की, 
एक और कहानी कह रहा है..
ये सारी चीज़ें मेरे ज़हन में जन्मे ,..बढ़ रहे,..बरगद" की शाख़ों पर सजी पतंगें ही तो हैं....और कुछ तो ख़ुद में ही.,,एक शाख़..

***

@P

...आज तुमने एक वक़्त दिया था.,मिलने का.
और मैं,.. तुम्हारा मुन्तज़िर था..
वहाँ घाट की सीढ़ियों पर बैठे-बैठे.,मन में बहुत सारी बातें आयीं,.जिनमे से एक बात ये भी थी कि.,बाबा का इंतज़ार हमने भले ही हर रविवार किया हो.,लेकिन वो हर रविवार नहीं आते थे..
आज भी वैसा ही एक रविवार रहा..जिनमे मेरा इंतज़ार पूरा नहीं होता था..
...
..अभी के लिए इतना ही..
इसे यहीं., ख़त्म नहीं कर सकता...क्यूँकि,
अभी तो इस बरगद में.,
और न-जाने कितनी शाख़ें.,कितनी जटाएं.,और कितनी पतंगें आनी बाक़ी हैं...
...जो दिन-ब-दिन और घना होगा..
..जो दिन-ब-दिन  और बहुत कुछ देखेगा..और बहुत कुछ सोचेगा-समझेगा..और बढ़ेगा..खूब बढ़ेगा..
..और इस दौर में.,
..उसमे कुछ .,नयी पत्तियाँ भी आयेंगी..नयी..हरी पत्तियाँ..
..,क्यूँकि.,ये मेरे ज़हन का बरगद है...
                                             
                     ..., मेरी बातों का बरगद"








@p


Saturday, 14 May 2016

..,थोड़ा ही सही



थोड़ा ही सही पर पास थी तुम,
इक पाक़ीज़ा एहसास थी तुम..
आये जो मुझे वो रास थी तुम,
और एक अजब सा त्रास थी तुम..
थी अपनी तो तुम सबके लिए, 
पर मेरे लिए कुछ ख़ास थी तुम..
**
रातों की नाज़ुक नीद भी थी,
और सुबह कि पहली चाय थी तुम..
जिसकी अभिव्यक्ति मौन करे,
वही शब्दहीन सी याद थी तुम..
कभी कृष्ण-पक्ष की विभावरी, 
कभी शुक्ल-पक्ष का चाँद थी तुम..
**
थी कभी चमकता भानु गगन,
तो कभी पिघलती शाम थी तुम..
मन-मथुरा जिस बिन निर्धन हो,
उस वृन्दावन का धन थी तुम..
शरदीय-चैत्र नवरात्रि भी थी,
फिर पाक़ माह-ए-रमजान थी तुम.. 
**
इक अन्य-अनन्य कल्पना भी,
और एक अमिय-वरदान थी तुम..
थी पहले-पहल की मुश्किल तुम,
फिर सहज-सिद्ध आसान थी तुम..
खुशियों में अधर-मुस्कान थी तुम,
और दु:खद क्षणों में राम थी तुम..
**
मेरे मन का इक पुष्प-कँवल,
प्राणों का अंतस्थल थी तुम..
बिन जिसके धीरज-धूमिल हो,
सच्चा वो मेरा संबल थी तुम..
मरुभूमि जिसे पा भूमि बनी,
उसकी नियति का जल थी तुम..
**
मेरा सर्वस्व मेरा गौरव,
मेरा जीवन अभिमान थी तुम..
हों सब इससे अनभिज्ञ मगर,
इस सच से कहाँ अनजान थी तुम,?
जैसी भी थी..,जितनी भी थी,
मेरे तो.. ''चारो धाम थी तुम..
मैं इक सागर था प्यासा सा,
और उसकी पावन प्यास थी तुम..
     ..इक पाक़ीज़ा एहसास थी.. तुम'
     ..थोड़ा ही सही पर पास थी.. तुम'


.@

Saturday, 30 January 2016

इस बार...तुम' कुछ ग़लत' आये हो...

***
इस बार...तुम' कुछ ग़लत' आये हो...
शायद वक़्त से..बहुत पहले,
या फिर..बेवक्त' आये हो..
...पर इस बार..तुम' कुछ ग़लत ' आये हो...
***
.,अब क्या,?
.,अब क्यूँ,?
.,किसलिए..?,और किसके लिए आये हो.,?
अब...कुछ भी तो नहीं मेरे पास.,
जो था'.,वो' दिया तो था तुम्हें पिछली बार.,
पर उसे' तो तुम कहीं छोड़' आये हो..
गए साल कहीं अख़बार  में पढ़ी थी ये ख़बर,
औरों की तरह तुम भी वो पुराना दिल'...कहीं तोड़' आये हो...
...इस बार...तुम कुछ ग़लत 'आये हो ..
***
न..ना.!
बुरा मत मानो..!
ये शिक़ायत' नहीं.,बस एक रवायत' है.,
जो मुझे निभानी है..तुम्हारी बदौलत..
क्योंकि तुम.,मेरी बला से .,इसका इक सिरा',..कब का....,कहीं भूल' आये हो..!
...इस बार तुम कुछ...
***
जाओ..!
वापस चले जाओ..!
इस बार जो आये हो तो.,हमने तुम्हें माफ़ किया.,
अपना ज़ख़्मी दिल हमने अपनी तरफ से साफ़ किया..
..लेकिन,.अब इस राह मत आना.!
बहुत रोई हैं...ये आँखें.,
इन्हें अब और...मत रुलाना.!
थोड़ा वक़्त तो लगता ही है...सम्भलने में .,
यूँ ही ..बेवक्त आकर फिर से..,मत गिरना .,!
..जाओ और अब मत आना..!
***
..अच्छा इक बात पूछूं.,?
,बताओगे ..?
अब तो तुम्हें ये कसम देते भी नहीं बनती.,
,कि कुछ भी नहीं छुपाओगे..
...
.,क्या? हम तुम्हें अब., ज़रा भी याद नहीं आते .,
या अब तुम गंगा., उस पार नहीं जाते..
.,क्या? हमारी तुम्हें., कहीं भी याद नहीं आती .,
या घाटों कि वो सीढ़ियाँ., तुम्हें अब नहीं बुलाती ..
.,क्या तुम अब., रातों में चैन से सोते हो.?
या मेरी तरह., तुम भी तन्हा बैठ छत पर रोते हो..
.,क्या चाँद अब तुम्हारी., खिड़की पे नहीं आता.,
या अब तुम्हें वो उतना., पहले सा नहीं भाता ..
.,क्या,? रास्तों के मोड़., तुम्हें अब रोकते नहीं .,
या अब तुम इन मसलों पे., ज़्यादा सोचते नहीं ..
.,क्या,? अब तुम पीली-पतंगें.,  नहीं उड़ाते .,
या उड़ाते तो हो., पर पेंच अब नहीं लड़ाते ..
.,क्या,? अब मुझे देखने का., तुम्हारा मन नहीं होता .,
या अब तुम्हारे दिल में., वो सूनापन नहीं होता ..
.,क्या,? अब तुम मेरा कहीं,. इंतज़ार नहीं करते..
या अब मेरे लिए अपना वक़्त., बरबाद नहीं करते ..
.,क्या,? अब हम तुम्हारे,. लायक़ नहीं रहे .,
या इश्क़ में तुम अब,. अलानाहक़ नहीं रहे ...
...
....
***
तो कहो,.!
..अब क्या कहें.,?
.,कि.,
..इसे ख़त्म' कर दो...
यहाँ घाटों में एक घाट ..हरिश्चन्द्र' भी है,
वहीँ इक रस्म' के तहत., मुझे भी भस्म' कर दो..
..बहुत कर ली मुहब्बत' इस जहाँ' में ,
...मुझे अब ले चलो' और दफ्न' कर दो...
..
***
..ये पहले भी कही,. और फिर से यह दोहरा' रहे हैं..
जहाँ छोड़ा था तुमने,. हम वहीँ' से आ रहें..
,.सो अब बेहतर यही होगा,. कि तुम ख़ुद को ये 'समझाओ .,
हम अब वैसे' नहीं,. जैसा हमे तुम छोड़' आये हो..
बहुत से मोड़' आते हैं..,सफ़र ये' है ही कुछ ऐसा .,
उन्हीं में तुम भी अपने नाम' का,. इक मोड़' लाये हो..
....
......
.......बुरा मत मानना लेकिन,. सदाक़त ही यही है..,
.......बुरा मत मानना लेकिन,. हकीक़त भी यही है...

                             कि,तुम इस बार कुछ गलत आये हो.,
                              .,शायद वक़्त से.,
बहुत पहले.,
                                या फिर,.

                            ..,बेवक़्त आये हो..
                           पर .,.इस बार जो आये हो...तुम '
                                 .कुछ ग़लत'आये हो...
                        

                         ,पर .,.इस बार जो आये हो...तुम '
                                .कुछ  ग़लत'आये हो...
                                                                                                           






 

Thursday, 5 November 2015

फिर क्यूँ,.?,मैं तुम" पर रुकता हूँ...


***
इन दिनों तसव्वुर में बस इक,
       तस्वीर बना कर रखता हूँ..
यूँ रुकना फ़ितरत मेरी नहीं,
       फिर क्यूँ.,?,मैं तुम पर रुकता हूँ..
तुम ख़ुश हो या हो ना-ख़ुश  इन,
      बातों की वक़ालत करता हूँ..
सारी राहों को भूल-भाल.,
     इक तेरी गली में रुकता हूँ..
तुम ऐसी भी कोई खूब नहीं.,
     फिर क्यूँ..?,तुम्हें हूर समझता हूँ..

***

तुम' मुझसी नहीं मैं' तुमसा नहीं.,
     ये बातें भी ख़ुद से कहता हूँ.,
पर ना जाने क्यूँ.,?,दिल मेरा.. 
     कुछ तेरे खिलाफ़ में सुनता नहीं..
मैं कहता हूँ दिल तू ऐसा न कर.,
    फिर ख़ुद ही बग़ावत करता हूँ...
कल-तक जो ज़रा सी उलझन थी.,
    अब उसमे और उलझता हूँ...
इतना-उतना इसे मत समझो..
    जो भी है मुक़म्मल करता हूँ...
चाहे सब विस्मृत हो जाए.,
    पर याद तुम्हें क्यूँ,.?,रखता हूँ..

***

माँ से हर बार कहा सच ही.,
    पर अब जाने क्यूँ,.?,अटकता हूँ.
कल फिर टोंका था माँ ने मुझे.,
    .,और पूछा-सब कुछ ठीक तो है..?
मैंने कह तो दिया-हाँ..!सब बढ़िया..!
    पर सच है ये झूठ मैं कहता हूँ..
..,कल तुमने कहा-अब मत मिलना.!
इस राह पे हासिल कुछ भी नहीं.!
    और सच ही कहा.,कुछ ग़लत नहीं!,
फिर क्यूँ.,?,इस राह पे चलता हूँ..
    तुझमें तो ख़ुदा भी दिखता नहीं,
फिर क्यूँ,.?,सज़दे में झुकता हूँ..
   तुम कोई ग़ज़ल या कविता नहीं,
फिर क्यूँ,.?,हर हर्फ़ में लिखता हूँ..

***

मैं जानता हूँ...तुम क़ाबिल हो,
     अपना ख़याल ख़ुद रख लोगी.
तुम्हें चाहने वाले कम भी नहीं,
     क्यूँ,.?,तुम्हें कहीं मुश्किल होगी..
फिर क्यूँ,.?,ख़ुद को फुसलाता हूँ..
     फिर क्यूँ,.?,इक चाह सी रखता हूँ...?
तुम्हें सड़कें..पार कराऊँ मैं..
     तुम्हें बारिश..से भी बचाऊँ मैं..
तुम्हें गिरते..हुए सम्भालूँ मैं..
     तुम्हें सही..ग़लत बतलाऊँ मैं..
तुम्हें बेहतर..और बनाऊँ मैं..
     कहीं तुझमे..फ़ना हो जाऊँ मैं..

***

यह भी है पता.,ये होना नहीं.,
     फिर क्यूँ.,?,मैं यह सब सोचता हूँ..
..,कल तुमने कहा-अब मत सोचो,!
    कुछ पढ़ो-लिखो और बड़े बनो.!
और सच ही कहा.,कुछ ग़लत नहीं.,
     फिर क्यूँ,.?,मैं नादाँ बनता हूँ..
क्यूँ,.?नाम तुम्हारा" लेकर ही,
    मैं ख़ुद को बड़ा समझता हूँ..
है पता मुझे मैं कुछ भी नहीं.,
    फिर क्यूँ,.?,तुम्हें सब-कुछ कहता हूँ..

***

अब क्या,.?,है ये..
क्यूँ,.?,है..
कैसे.,?,है..
इन प्रश्नों से हर क्षण लड़ता हूँ,
..ये इश्क़-विश्क़ तो खैर नहीं..
हाँ,.!, कुछ तो मैं तुमसे करता हूँ..
और क्यूँ,.?, को तो बस अब परे रखो..!
मैं यूँ-ही तुम पे मरता हूँ..
और रही बात इस कैसे,.?,की.,
तो.,जैसे जल को धार करे.,ज्यों नौका को पतवार करे.!
जैसे अमृत को देव करें.,ज्यों विष को मेरे महादेव करें.!
जैसे तारों को रात करे.,ज्यों श्रावण को बरसात करे.!
जैसे ज्वर को तन उष्ण करे.,ज्यों वृन्दावन को कृष्ण करे..!


***

कुछ ऐसे ही हैं...एहसास मेरे,
जो दिल में छुपाये रखता हूँ..
तुम्हें पाना तो मकसद यूँ भी नहीं.,
फिर क्यूँ.,?,खोने से डरता हूँ..
कल तुमने कहा-अब मत मिलना .,!
कुछ भी हो.,मगर चलते रहना..!
और सच ही कहा,कुछ गलत नहीं.,
फिर क्यूँ,.?,उस ओर मैं चलता हूँ..
............जिस ओर किसी चौराहे से,.
                   इक नाज़ुक गली मचलती है..
           जो चार दफ़े बलखाते हुए,
                  आखिर तेरे घर को पहुँचती है..
जिस घर में सभी सयाने हैं,
                  वहीं एक दीवानी" रहती है..
 जो ये कहती है कि.,तुम पागल हो !,
                  पर इसमें भी मैं ख़ुश रहता हूँ.
ये अच्छा तो है पर ठीक नहीं.,
यह बात भी खूब समझता हूँ...
अब किससे कहूँ,.?,और क्यूँ.,?,मैं कहूँ.?
इन दिनों...मैं कैसे रहता हूँ..?
....सारी राहों को भूल-भाल,.इक तेरी गली में रुकता हूँ..
.......तुम जहाँ देर से-ही आती हो .,मैं वक़्त से पहले पहुँचता हूँ..
..........यूँ रुकना फ़ितरत मेरी नहीं...फिर क्यूँ,.?,मैं तुम पर रुकता हूँ...
..,                                                                                        
..,.,,
                   ...फिर क्यूँ,.?,मैं तुम" पर रुकता हूँ...


Monday, 19 October 2015

..ये ज़िन्दगी कब तक राज़ी है.?

*****

..बातें तो इतनी थी यहाँ लिखना शुरू करने से पहले कि,ग़र सारी लिख सकते.,तो शायद आपको पढ़ने में महीनों लग जाते..लेकिन नहीं.!
वक़्त बड़ी चीज़ है.,और शौक़ तो खैर.!,बड़ी चीज़ है ही,इसलिए आपका ज़्यादा वक़्त नहीं लेंगे हम..और शौक़.,,.शौक़” अपना आप बरक़रार रखें..
आज यहाँ आपसे क्या बातें होंगी..ठीक-ठीक हमें भी नहीं पता.लेकिन एक बात का हमे अन्देशा है..कि,हमारी बातें शायद आज आपको उतनी भली न लगें...तो इसलिए हम पहले ही बता देना चाहते हैं.
आज हमारी बातों को आप दिल पर क़तई न लें.!,और ये तो बिलकुल भी न माने कि, इसका किसी भी वास्तविक घटना से कोई सम्बन्ध है.
हाँ,.! अगर किसी वास्तविक घटना के साथ इसकी समानता होती है,तो इसे मात्र एक संयोग कहा जाएगा..
..अब आगे..,
ये वो बातें हैं जिन्हें सुनकर-पढ़कर..आप बड़े आराम से कह सकते हैं कि.,
अरे.,!!! ये सब बस बातें हैं.,बातें.!,ठीक है,.ऐसा होना भी चाहिए..लेकिन ऐसा उतनी अच्छी तरह मुमकिन नहीं है...जितनी अच्छी तरह आप सोच रहे हैं.
हाँ.!हाँ.! भई..! हम बिलकुल सहमत हैं आपसे..कि,ये बस हमारा ख़याली-ख़ुर्मा है.
इसीलिए तो.,हमने पहले ही कह दिया,.कि.,इसका किसी भी वास्तविक घटना के साथ कोई सम्बन्ध नहीं है...:-)
अक्सर..हम लोगों के मुँह से एक बात सुनते हैं कि.,हर रिश्ते में एक दूरी होनी चाहिए..या फिर अधिक मिठाई में चींटियाँ लगती हैं..और अभी कुछ दिन हुए हमारी छोटी बहन तारीफ़” ने एक और पंचलाइन सुना दी हमें.,कि,भाईजान..! चाय में चीनी ज़्यादा होगी..,तो ब्लड-शुगर हो जाएगा..!
वाह..!...लोग तो लोग अब अपने घर के क़िरदार भी तकनीकी हो गए हैं.
जहाँपनाह” माफ़ करिए..!
लेकिन हम ऐसा ख़याल रखने वालों को तकनीकी ही समझते हैं..जो.,रिश्तों को चाय और चीनी का इतना सुन्दर-संगम बताते हुए भी उसमे ख़ामी खोज लेते हैं.
चाय और चीनी.,
लेकिन ये भी अजीब मसला है.,ब्लड-शुगर हो आदमी को.,और दूर..,चाय से चीनी को कर दिया जाता है...जहाँ अभी तक बेचारी चाय से तीन चम्मच मिलती थी..,अब डेढ़ में ही मिल के मन-मसोसना होता है.
...लोग भी न.,ये बताने में ज़रा भी देर नहीं लगाते कि.,अधिक मिठाई में चींटियाँ पड़ती हैं..लेकिन आज तलक किसी ने ये बताने की ज़हमत मोल नहीं ली..कि,चींटियाँ पड़ जाने के बाद उस मिठाई का क्या करना है..?
...और ख़ुदा के वास्ते अब ये मत कहने लगियेगा कि.,उन मिठाईयों को फेंक दें...क्यूँकि..,ये मिठाईयां रिश्तों की मिसाल में पेश की गयीं हैं...और रिश्ते फ़ेंकने की चीज़ नहीं होते..ये आप जानते ही होंगे..
खैर..!
हमारी समझ से ज़िन्दगी को लेकर.,ऐसे उदाहरणों को प्रतिबंधित कर देना चाहिए जो...नकारात्मक समझ या प्रभाव पैदा करते हों..अब कुछ बुद्धिजीवी लोग ये भी कह सकते हैं..कि,अरे ऐसा कैसे.?.,इस तरह तो आप एहसासों को बाँध रहे हैं....एकांगी कर रहे हैं.,हम सिर्फ अच्छा ही जाने ये कैसे हो सकता है..?बुरा भी पता होना चाहिए..!
हुज़ूर-ए-आला,.! हम ऐसा कुछ भी नहीं कह रहे..कि,आप सिर्फ़ काला ही जाने सफ़ेद  नहीं..!
..,अजी हमारी क्या मज़ाल.,?
जो हम आपको ऐसी बिना सिर-पैर की बातों के मशविरे दे सकें.?
मगर,.!आप शायद फिर इस ग़ुलाम’ की बातों पर थोड़ा कम ध्यान दे रहें हैं.
हुज़ूर” हमने शुरुआत में ही...इक़रारनामा” लिख दिया है...कि.,ये सब बस बातें हैं बातें...और कुछ नहीं..!
ऐसे में आप नाराज़ न हों हम पर...ज़रा मेहरबानी करें..!..रहम फ़रमायें,!
आइये थोड़ा.! और सुनिए हमे ..!
तो,.!
हमारा बस इतना कहना है..कि,रिश्ते नाप-तौल कर भला कैसे बनाये जा सकते हैं.,?या फिर जो नाप-तौल कर बनाये जाते हैं क्या वो रिश्ते ही हैं.?
मतलब..,हमें किसी से स्नेह है...तो हम उसे तीन किलो प्यार देंगे...वो भी निर्भर करता है.,कि.,वो भी हमें बदले में तीन किलो ही प्यार देता है या नहीं?
हाँ..!हाँ..! हँसिये नहीं भई.,!
...ये तो ,हमने अहतियाती तौर पर सोचा है..,नहीं तो मुश्किल और तकलीफ़ की बात तो ये है कि.,कहीं हमें या उसे ब्लड-शुगर हो गया तो?
...खामख्वा चीनी कम हो जाएगी..
दूसरी बात..,जहाँ देखो लोग पञ्चलाइन सुना देते हैं कि.,हमें हर रिश्ते में एक डिस्टेंस मेन्टेन करनी चाहिए..!
.,मतलब उचित---------दूरी” बनाये रखें..!
.,नहीं तो किसी भी वक़्त दुर्घटना हो सकती है.
मानो ये रिश्ते नहीं हमारी लखनऊ के पॉलिटेक्निक चौराहे से पत्रकारपुरम को जाते ऑटो रिक्शे हों..एक-दूसरे के आगे-पीछे..
अरे भाई.!.,रिश्ते आपके साथ चलना चाहते हैं..आपके आगे या पीछे भागना-दौड़ना  नहीं.
हमें तो बिलकुल नहीं भाती ये तकनीकी समझदारी वाली बातें.
लेकिन आज-कल ऐसा ही है...हर आदमी अपने साथ के लोगों से अपनी ज़िन्दगी में एक स्पेस”” माँगता है.
हम किसी ख़ास रिश्ते की बात नहीं कर रहे...ऐसा अक्सर हो रहा है..
जो तकलीफ़-देह है..
खैर.!
हमने किसी साथी के मुँह सुना कि.,भाईजान.! उन्हें हमारे रिश्ते में एक स्पेस की दरक़ार है.
और ये सुनते ही हमें हँसी सी आ गयी..कि.,आज-कल लोग क्या बड़ी-बड़ी फ़रमाइशें करते हैं.,कहाँ ये माँग कभी चाँद-तारों तक ही सीमित थी.
लेकिन अब वो भी लोगों को कम ही लग रहा है.,इसीलिए तो...अब,.मार्स या जुपिटर नहीं...सीधे...स्पेस”
भला वो अन्तरिक्ष” का करेंगे क्या?
हमने हमारे साथी से पूछा.
हमारी इस बेवकूफ़ी पर बड़ी ख़ुशी हुई उन्हें.,फ़िर.,बिना कुछ कहे चले गए...
..और हम सोचते रहे..कि,ये तो वैश्विक-विमर्श की बात है...मान ;लीजिये कल किसी सामर्थ्यवान शख्स से किसी ने ये माँग कर ली..और उसने समेट कर स्पेस सामने वाले की खिड़की पर चिपका दिया...तो.,हमारी आने वाली...पीढ़ी का क्या होगा.?..और बाक़ी चीज़ों में तो हम चलिए थोड़े बेपरवाह हो भी जाते हैं...पर मेरी छोटी बहन...तारीफ़’’....उसके ख़्वाबों का क्या होगा.?..उसे इसरो” जो जाना है..?
...अल्लाह..रहम करे..!

*****

दूरी..,ज़्यादा-नज़दीकी.,अधिक-मिठाई..और,ऐसे कई और शब्द हैं...जो अक्सर हमारे आस-पास मौजूद कई लोगों की ज़िन्दगी में एक वजह...बेवजह पैदा करते रहें हैं..
रिश्ते चीनी और मिठाई से कहीं ज़्यादा अहमियत रखते हैं..और अपनापन.,स्नेह.,प्रेम.,आत्मीयता.,लगाव..ये जितने भी एहसास हैं नाम से ही अलग हैं बाक़ी सबकी एक ही ख़ासियत है.,ये बड़े नायाब हैं..अनमोल हैं..
नहीं समझ आती ये बात हमें कि.,प्रेम भला कभी काफ़ी..या फिर पर्याप्त कैसे हो सकता है..?
या फिर अगर आपको लगता है कि.,ऐसा नहीं है...पर्याप्त होता है प्रेम”..
,तो फिर हम उन कुछ लोगों से एक सवाल करना चाहेंगे...जिन्होंने कभी किसी से कोई रिश्ता रखा रहा हो.,और आज वह रिश्ता.,वह शख्स आपके साथ नहीं हो...चाहे वह दोस्ती रही हो.,इश्क़-विश्क़ रहा हो.,या कुछ और,.
हम उसे किसी शब्द की ज़द में नहीं रखना चाहते..
तो क्या अब आपके दिल में उसके/उनके लिए वो जज़्बात पूरी.. तरह बीत-रीत चुके हैं..?
अगर.,आप अभी तक जवाब सोच रहे हैं..तो रहने दीजे..हमें इस जवाब की कोई बहोत ज़रुरत नहीं है...वो तो हम आपको...याद दिलाना चाहते थे...कि.,आप ऐसे नहीं हैं...जैसे आप इन दिनों हो गए हैं..
हाँ .,! अगर आप जवाब.,हाँ.! में देना चाहते थे या हैं...तो माफ़ करें!
...आप हमें बरगला रहे....और हमसे कहीं और ज़्यादा अपने आपको..
लेकिन ज़रा ठहरिये..,जनाब.!
अभी हमने असल सवाल तो पूछा ही नहीं आपसे.,,सवाल प्रेम की पर्याप्तता की परख़ का है...हालाँकि प्रेम परख-वरख की चीज़ नहीं है..लेकिन..!
तो पर्याप्तता का प्रश्न वर्तमान से होना चाहिए...न कि अतीत या अनंत से..
अतः.,अब आप ये बतायें.,क्या अभी वर्तमान में कोई ऐसा आपका प्रिय भाई-बन्धु या सखा-सनेही है..?,.जिसके सन्दर्भ में अब आप यह महसूस करते हैं कि.,आप उसे पर्याप्त प्रेम दे चुके हैं..और दो-एक दिन में आगे प्रेम देना बंद करने वाले हैं.!
क्या है कोई ऐसा ?
हमें तो नहीं लगता कि ऐसा कुछ होगा.
फिर भी...आप पूरी तरह आज़ाद हैं...सोचने और करने दोनों के लिए...
हमारा क्या है..?हम तो बस बातें करते हैं.
लेकिन हमारी ज़िन्दगी में अभी तक तो कोई भी ऐसा नहीं है...जिसे हम पर्याप्त प्रेम-स्नेह दे चुके हैं..और होगा भी नहीं क्यूँकि.,
हमारे चचाजान ने हमें बचपन से यही सिखलाया है
कि,.नवाब-साहेब.,!
कभी भी..खुदा के लिए,. ज़हन में यह ख़याल मत लाना कि., आपने किसी के लिए बहोत कुछ किया.,.क्यूँकि जिस वक़्त आपने अपने मन में ये ख़याल लाया होता है,.उसी वक़्त आपका सारा किया-कराया मिट्टी हो जाता है..
और दूसरा कि.,बस.! अब बहोत हुआ.,अब हम किसी के लिए इतना कुछ नहीं करेंगे...!
यह दूसरी बात कि.,बस,.! अब बहोत हुआ” चचा ने इस मक़सद में कहीं थीं कि.,अक्सर हम इस ख़याल से बुखार में होते थे कि.,नहीं.! उन्होंने हमारे ज़ज्बातों की हर बार अनदेखी की है...और अब और नहीं..!
लेकिन ऐसा सोचने के बाद भी हमें कोई ख़ासा सुकूँ या राहत नहीं हासिल होती थी..
इसलिए चचाजान हमें समझाते थे- नवाब.,! रिश्ते दीवारों पर बनी उन खिड़कियों
की तरह होते हैं..जिन्हें हम जब मर्ज़ी खोल दिया जब मर्ज़ी बंद कर दिया करते हैं..और उनकी अहमियत हमे भूल सी जाती है..लेकिन वही खिड़कियाँ..जब दीवार पर नहीं होतीं तो..हमें उनकी अहमियत मालूम होती है..लेकिन हममे से ज़्यादातर लोग...ऐसे ही होते हैं..मियाँ.,! जो चीज़ों की क़द्र कम ही कर पाते हैं..और खिड़कियों को भूल जाते हैं..

*****

चाचू...हमारी ख़ातिर क़ुरान.,गीता.,बाइबिल.,और सब कुछ हैं..या कहिये.,कि हमारी प्राइवेट बुक-शेल्फ़ हैं..
लेकिन नहीं..तो हमें डिस्टेंस मेन्टेन करनी है...
एक मिनट-एक मिनट आप कहीं ये तो नहीं समझ रहे.,कि.,हम मर्यादा को लांघने की बात कर रहे...
हाँ..! हो सकता है...लेकिन नहीं..! आप ऐसा कतई न सोचें...वो एक अलग मसला है...उस पर भी कभी कहीं कोई कोफ़्त हुई दिल में.,तो आपके पास ही आयेंगे...अपने दिल का दर्द सुनाने..
खैर.,!इस डिस्टेंस के मामले में हम ज़रा मुख्तलिफ़ नज़रिया रखते हैं..!
अरे.,! आप तो फिर हम पर अपनी निगाहें तिरछी करने लगे..!
देखिये.,! हम ठहरे ग़ुलाम आदमी हम पर ऐसी निगाह डालेंगे आप तो हम कहाँ कुछ कह पायेंगे..?
और फिर मेरी बातों को दिल पर न लीजेगा..!ये सब तो बस यूँ ही है...
हम्म.! तो बात कुछ यूँ है..,कि.,इस रिलेशन में डिस्टेंस से पहले हमने..डिस्टेंस में लर्निंग की बात सुनी थी..जिसमे लोग घर बैठे अपनी अधूरी या रुकी हुई पढ़ाई को पूरा करते थे..आज भी है...लोग करते ही हैं...अच्छा है...सहज है..सरल है कि, नहीं हमे नहीं पता.,!
तो जनाब ये डिस्टेंस लर्निंग में तो ठीक थी...लेकिन रिश्तों में डिस्टेंस..?
अब रिश्ते कोई कोर्स तो हैं नहीं (बकौल.,शिराज़..जो हमारे ही मोहल्ले के शर्मीले आशिक़ हैं.) कि.,चार साल में-पाँच साल में पूरे हो जाँय..ये तो उम्र-भर चलते रहते हैं...और अगर नहीं भी चलते रहते हैं...तो रहते तो ज़रूर ही हैं...
चलें-वलें भले ही न..
तो हम भला उन्हें ख़ुद से एक तय दूरी पर कैसे रख सकते हैं..?
हमें ग़र अपनी दादीजान के पैर दबाने हैं..तो हम फ़ोन पर तो ऐसा मुमकिन कर नहीं सकते..और चलिये फ़ोन की बात ही छोड़ें...उनके सामने भी रहकर..उनसे दो फ़ीट की दूरी पर भी बैठ कर.,क्या हम उनके पैर दबा सकते हैं..?
या फिर दादी क्या.,?हमें उस दौरान अपनी ज़ीस्त के उन तमाम तज़ुर्बों को सुना सकतीं हैं..?जो..वो हमे रोज़.,तब सुनाया करतीं हैं जब उनका नवाब” उनके पैर..अपनी गोद में लिए इस यक़ीन के साथ दबा रहा होता है..कि.,ये पैर मेरी दादीजान के हैं...वो दादीजान जो मेरी ख़ातिर ख़ुदा हैं..
हमें ग़र अपने अब्बू की चप्पलें उनके पैरों में पहनानी हैं..तब जब.,वो शाम को बाज़ार के लिए निकल रहे हों...तो हम इसमें एक डिस्टेंस संजोयें..?
हमें ग़र अपनी बहन का ख़याल तब रखना है,.जब उसे पिछले पाँच दिनों से बुख़ार हो...तो हम यह बात ध्यान में रखेंगे..कि..हमे डिस्टेंस रखनी है..?
...माफ़ कीजियेगा साहब..!.,हमारी बहन..हमारे भाई.,हमारे चाचू.,हमारी दादी...से बढ़कर नहीं हो सकती ये डिस्टेंस” या स्पेस” हमारे लिए...
और क्या-क्या कहें.,हुज़ूर.?,
हमारी परवरिश हमारे अपनों ने उन हाथों से की है...जिन्हें डिस्टेंस शब्द का मतलब भी नहीं पता...
और शायद यही वो फ़र्क है.,जो हममें और आप में..दिख रहा है..,कि.,
आप डिस्टेंस की वक़ालत कर रहे हैं...और हम सेंटीमेन्ट्स की...
अभी कुछ दिन पहले ही हमने किसी कवि या शायर जो भी हों..उनकी कुछ लाइने पढ़ीं..कि.,एक बादल और एक बादल मिलकर एक ही बादल’ तो होते हैं..,एक नदी और एक नदी मिलकर एक नदी’ ही तो बनती है..तो फिर.,हम और तुम मिलकर दो’ क्यूँ?????
ये....कुछ लाइने थीं...जो हमे बहोत कुछ बता गयीं..
आप ख़ुद सोचें न.?.,कि क्या हमारे अम्मी-अब्बू ने हमारी परवरिश कभी एक फ़ासला रखते हुए की .,?
कि.,नहीं इतना ही प्यार दो...नहीं तो ये बिगड़ जाएगा..!
क्या हुआ.?..हम पर हँसी आ गयी कि.,ये हम क्या पूछ बैठे?
तो साहब...बच्चे लाड-दुलार से नहीं लापरवाही से बिगड़ते हैं...और आपके हिसाब से उनकी हर ख्वाहिश पूरी करना लाड-दुलार है....नहीं जनाब..!
इसे असल में लापरवाही कहते हैं..जिसमे आप बस किसी की ज़िद पूरी करते हैं...ज़रूरते नहीं..
और यहीं आप हमारी समझ से थोड़े ग़लत हो जाते हैं...
..फ़िलहाल.,!अब इस डिस्टेंस की प्रजेंस को थोड़ा इग्नोरेंस के हवाले करते हैं...और एक दूसरे मसले पर आते हैं..

*****

..नाराज़गी”
..ये भी एक शब्द है जिसकी वजह से हम अक्सर लोगों को किसी पर बिफ़रते देखते हैं..
.,किसी ने हमारी फ़ोन कॉल नहीं रिसीव की.,उस पर नाराज़गी..
.,किसी ने हमें बाद में कॉल-बैक नहीं की,.!,उस पर नाराज़गी..
.,किसी ने हमें इगनोर कर दिया.!,उस पर नाराज़गी..
.,किसी ने हमें उतना नहीं समझा जितना हम उसे समझते हैं,!,उस पर नाराज़गी..
.,किसी ने हमे सॉरी नहीं बोला.,!उस पर नाराज़गी..
.,किसी ने........अरे बस करिए साहब..!..,क्या चाहते हैं कि.,हम सब कुछ लिख दें यहाँ और फिर लोगों को हमसे भी हो जाए...,,,,,,,नाराज़गी..!
तो हुज़ूर...हाल कम-ओ-बेश कुछ ऐसा ही है...कि.,लोग राज़ी कम...और नाराज़ ज्यादा हैं.
अब कुछ लोग इतना पढ़ कर शायद मन ही मन ये कह रहे हों..!
कि.,अब इसमें भला क्या तकलीफ़ हो गयी आपको..?..ये राज़ी होना.,नाराज़ होना तो चलता रहता है..लाइफ है भाई..! इसी को तो कहते हैं जीवन...
हाँ.,!हाँ..!
एक दम सही सरकार.,!
हमारी तो ऑंखें खोल दी आपने.!
लेकिन सिर्फ यही लाइफ हो जाय.,! तो.,कैसा रहेगा..?
नहीं समझे .,!?
ज़रा ठरिये..!अभी समझ जायेंगे आप..!
तो जनाब हम नाराज़ होने के विपक्ष में नहीं हैं.!
हम सिर्फ “नाराज़-रहने” के विपक्ष में हैं...
रहने” से हमारा मतलब...एक लम्बे समय तक चलने वाली नाराज़गी..
आपको एक छोटा सा वाक़िया सुनाते हैं...बात हाई-स्कूल की है...हमारी क्लास में हमारे एक अभिन्न मित्र थे...अभिषेक पाण्डेय..जो अभी भी हमारे वैसे ही मित्र हैं.
किसी दिन किसी बात पर हमारी बहस हो गयी और बहस मन मुटाव तक जा पहुँची.
नाराज़गी दिखाने का जो शाश्वत तरीका है...वो ये है..कि.,आप जिससे नाराज़ हैं...उसे इगनोरे करें....उससे कोई बात न करें.,या फिर करें तो बस हूँ-हाँ तक ही..!
ताकि..,उसे कुछ एहसास-वहसास हो..और वो आपसे पूछे या और स्पष्ट कहें कि.,क्षमा प्रार्थना करे..!
तो हमने भी लगभग वैसा ही किया.,हालाँकि यह सत्य बात है..कि हमने नाराज़गी जताई थी...लेकिन इस आशा-प्रत्याशा से विरक्त..,कि.,वह हमसे माफ़ी-वाफी माँगे..!
क्यूँकि.,हमें कभी इस बात की चाहत न तो हुई है और न ही होगी कि.,जिन्हें हमने प्रेम किया हो..,वो हमसे माफ़ी माँगें और हम उन्हें माफ़ी दे कर यह महसूस करें कि.,हम कितने सही और वो कितने गलत थे.!?
हाँ..! किसी की कोई हरक़त ग़र तकलीफ़ दे जाती है.,..तो बस इतनी ही ख्वाहिश होती है..,कि.,वो बस वापस आ जाए मेरे पास-मेरे साथ रहे भर...
बस...और कुछ नहीं..!
और भला किस बात की माफ़ी.,?हम कोई ग़लती करें.,हमारे किसी अजीज़ से कोई ग़लती हो जाय.,एक ही बात है.
तो इस हिसाब से माफ़ी भी कोई माँग ले...एक ही बात है..
और...मियाँ!!...ये जो चाहत है न..,कि जिसने ग़लती की है,उसे अपनी ग़लती का एहसास भी हो...इसलिए हम नाराज़ रहेंगे..
तो हुज़ूर छोड़ भी दीजिये ये अला-नाहक़ की अठ्न्नी वाली अना..अब तो ये बाज़ार में चलती भी नहीं..!
अब हमारे छोटे भाई विकू” को ही ले लीजिये...बेमुरौव्वत” पर हमें एक बार किसी मासूम सी वजह के चलते बड़ी कोफ़्त हुई कि.,इसे इतना भी एहसास नहीं की इसने हमें तकलीफ़ पहुँचायी..!
तो क्या हम उससे नाराज़ हैं आज..?
रत्ती भर भी नहीं...!
और पगले की मासूमियत तो देखो आज तक एहसास नहीं हुआ..,उसे..!
हाँ.,!बता दिया था हमने.,कि विकू’ आपकी एक बात हमें अच्छी नहीं लगी...लेकिन कौन सी बात ये नहीं बताई थी..और सच कहें तो.,अब हमें भी कुछ ठीक से याद नहीं.!,
आज भी कभी-कभी पूँछता है...अच्छा भैया.,!वो बात कौन सी थी.,?जिससे आप हम पर नाराज़ हुए थे...कुछ घंटों के लिये?
..,और फिर हम भी हँसते हैं...वो भी...
..,क्या करें.?..ग़र नहीं है उसे एहसास?
अब इस वजह से उससे बात करनी तो.,बंद नहीं कर सकते न?
और ग़र बात करनी बंद कर भी दी..,तो कितने दिन नहीं करेंगे..?
दो...चार..पाँच..आठ...ग्यारह..या फिर महीने दो महीने..?
नहीं.,!नही.,! ये तो हम न कर पायेंगे..!
और दिल से कह रहे हम...एक वक़्त के बाद ये गिले-शिकवे...नज़र ही नहीं आते..दूर-दूर तलक...सिर्फ़ और सिर्फ़ सुकून दिखता है..सुकून..
आज भी ग़र.,माफ़ी जैसे किसी मसले का ज़िक्र होता है...तो अभिषेक और अमन का ही ख़याल आता है..
खैर.,! तो हम अभिषेक के बारे में बता रहे थे..,फिर हम अभिषेक से दूर-दूर ही रहे..
दो-चार दिन बाद...जब हम अपने स्कूल के साइकिल स्टैंड के पास खड़े स्कूल गेट के खुलने का इंतज़ार कर रहे थे..,तो यकायक..अभिषेक हमारे सामने आके खड़े हो गए..
अपने चहरे पर एक प्रायश्चित-मिश्रित-मुस्कान के साथ..जिसमें आत्मग्लानि की आभा झलक रही थी..
अभिषेक ने दो-क्षण हमें देखने के पश्चात् हमसे कुछ पूछा था..?,ऐसा कुछ जिसे आज भी याद कर हमें उतनी ही ग्लानि महसूस होती है...जितनी तब हुई थी..
अभिषेक ने कहा था..,..अरे,.! यार” अब क्या ज़िन्दगी” भर नाराज़ ही रहेगा..!,.मान जा यार..!!
और ये शब्द.,उस क्षण मानो.,!मेरे न सिर्फ.,ह्रदय को...मन-मश्तिष्क को भी बेध से गए थे.
अभिषेक को दौड़कर गले लगाते हुए...हमने मन ही मन ये सोच लिया था कि.,आज के बाद कभी किसी से नाराज़ नहीं होना है..और ग़र हुए भी तो...इतनी आसानी से राज़ी होना है कि.,सामने वाले को भी अचरज़ हो कि.,हम नाराज़ थे भी या नहीं..?
खैर !.. ये तो हमारी बातें हैं....पर अब हर कोई ऐसा क्यूँ सोचे या मान ले.?
..नाराज़ होना लोग अपना अधिकार समझते हैं.
ठीक है हुज़ूर,.! माना हमने..!
.,लेकिन ये क्या कि आप अपनी इस अधिकार की कार में सवार हो...सामने वाले की आँखों की नींद को..कुचलते जा रहे हैं..कुचलते जा रहे हैं..?
..क्या..?.......क़ुसूर क्या है उनका ..?
..यही न,.?.. कि.,उन्होंने आपकी भावनाओं की सड़क पर किनारे कहीं अपनी
ना-समझी की मासूम सी नींद बिछा रखी थी..?
...माफ़ कीजियेगा..! हुज़ूर-ए-आला...!
मगर उनकीं आँखों में क़त्ल की गयी नींदों में...,ख़ाब शायद आप ही के होते थे..
एक बार फ़िर..माफ़ी माँगते हैं..!
ग़र किसीका” दिल दुखाया है हमने.!.और ये माफ़ी इसलिए माँग रहे.,क्यूंकि..,किसी को दुःख-तकलीफ़ देने का हक़ न तो है हमें..और न ही हम चाहते हैं...
लेकिन हमारी एक और बात पर थोड़ा ध्यान दीजेगा.,.अगर हमारी इस बात से आपका दिल दुखा है..
तो...समझ लीजियेगा कि,इस वक़्त किसी का दिल आपकी बदौलत भी दुःख रहा है...या दुःखा होगा...
रिश्ते बड़ी क़िस्मत से मिलते हैं..,जनाब.,.इन्हें नाराज़गी में ज़ाया न करें..!
क्या हुआ? ग़र किसी ने..नहीं समझा आपको,?
क्या हुआ? ग़र आपने..बहोत समझा किसी को,?
क्या हुआ? ग़र किसी ने बदले में यह नहीं पूछा कि, आप कैसे हैं?
क्या हुआ? ग़र लोगों को आपसे शिक़ायतें हैं?
...हमें नहीं लगता यह इतनी भी.,कोई” बड़ी बात है.,
....थोड़ा मुश्किल ज़रूर है...पर आसान भी बहोत है...नाराज़ न रहना...
.....अक्सर हम देखते हैं कि.,हमें जिनकी बदौलत कोई तकलीफ़ होती है..,हम उनसे इस फ़िराक में दूर हो जाते हैं..कि.,उनसे दूर रहने पर वो तकलीफ़ धीरे-धीरे कम हो जाएगी...इस वजह से हम उनका साथ तो खो ही देते हैं..साथ-साथ वो तकलीफ़ें...रह-रह कर एक टीस सी उभार देती हैं सीने में कहीं..,,तो क्यूँ न उनके साथ रहते हुए उस तकलीफ़ को जिया जाय..?..इस तरह कम-स-कम उनका पूरा या अधूरा कुछ तो साथ मिलेगा..
.......अब देखिये न नज़ीर” कितनी देर से हमें तंग कर रही है..
बार-बार फ़ोन देकर एक ही बात कह रही है...चाचू दिखा दो..!..,चाचू दिखा दो..!
क्या..?.फ़ोन में काऊ की इमेज..!
अभी थोड़ी देर पहले कुछ और फ़रमाइश थी इन साहबज़ादी की.,चाचू पिला दो.!.,चाचू पिला दो..!
क्या?..चाय.!
उससे पहले...बार-बार हम अपनी आँखें मूँद रहे थे...और ये ऑंखें खुलवाने के लिए मेरी पलकें ज़बरन खोल रहीं थीं..
और उसके पहले हमने वापस घर जाने का नाटक किया तो दौड़ कर हमारे क़दमों में सो जा रहीं थीं...रोते हुए..
यह वही नज़ीर” हैं....जिनसे हमारी मुलाक़ात अभी बस कुछ ही घंटों पहले हुई है..और हम इनके प्यारे चाचू बन गए हैं...
हालाँकि..!ये अभी बस तीन साल की ही हैं...और इन्होने हमें ऐसा कुछ कहा भी नहीं है..कि.,चाचू आप मेरे सबसे अच्छे चाचू हैं..फिर भी हम मान लेते हैं..
क्यूँकि...इसमें हमें कोई हर्ज़ नहीं दिख रहा..
लेकिन कल..और कल क्यूँ.,?.,अभी., यहाँ से हमारे जाने के बाद नज़ीर को...चाचू बस कुछ और देर याद रहेंगे...बस..
फिर नज़ीर..किसी और को तंग करेंगी...
और...सबसे अहम् बात...कल को हम फ़ोन करेंगे...तो मुमकिन है...नज़ीर हमारी कॉल रिसीव न कर पायें..या न करें...!
...हम मैसेज करें., तो शायद कोई रिप्लाई भी न करें..!
..और सौ बातों की एक बात...नज़ीर को ज़रा भी अहसास नहीं होगा कि.,उनके चाचू को उनकी इन हरक़तों से बुरा भी लग सकता है..,
तो क्या हम अपनी नज़ीर...से नाराज़ हो जाँय..?
आप भी सोच रहे होंगे..कि,अजीब हाल है.!..अब किसी बच्चे से क्या नाराज़गी..?
...हम भी कुछ ऐसा ही मानते हैं जनाब..!
 किसी को...स्नेह देना है...प्रेम करना है...तो बच्चों से सीख लें...!
वो हर हाल में खुश रहते हैं...उन्हें आपसे कभी कोई बड़ी शिक़ायत नहीं होती..और ग़र हुई भी तो...उन्हें मनाने के लिए...पाँच रुपये वाली मिल्कीबार चौकलेट ही बहोत है...
इस बार भूल गए थे..,नज़ीर के लिए कुछ ले नहीं आ पाये थे..
.,पर अगली बार पक्का कुछ ले आयेंगे...अपनी गुड़िया के लिए...
अरे..! आप अभी तक सोच रहे हैं..?
ख़ुदा-खैर करे...!
देखिये अपने सेल-फ़ोन पर...किसी ने कोई मैसेज-वैसेज या कॉल-वॉल तो नहीं की...?
क्या.,?? नहीं की.?
अरे.,!वाह .!
यही अच्छा मौका है...आप खुद कर लें..!.और अगर कॉल नहीं रिसीव हो.,तो एक  मेसेज ही ड्रॉप कर दें.!
अब लिखना क्या है..?.ये तो हम नहीं बता सकते..,वह आप तय कर लें...
,लेकिन मेहरबानी कर मेरे आक़ा...रिप्लाई न मिले...तो नाराज़ मत हो जाना..!
..
...
अच्छा तो अब हमे इज़ाज़त दें...
..आपका ज़्यादा वक़्त लिया हो..,और हमारी किसी बेवजह की बात से आपका दिल दुःखा हो...तो.,मेहरबानी कर हमें माफ़ करियेगा...बड़ी मेहरबानी होगी..!
…एक और बात,यदि कुछ शब्द दोष हुए हों.,तो पुनः माफ़ करियेगा ,.!
अपना ख़याल रखें और ख़ुश रहें..खुश रखें..
और किसी” से..,किसी” से भी कोई नाराज़गी न रखें...
...क्यूँकि नहीं पता...ये ज़िन्दगी कब तक राज़ी है...?
...
...

..ख़ुदा-हाफ़िज़